Motivational Story: राजा और बकरे की कहानी! जिसे पढ़कर आपकी दुनिया बदल जायेगी

Motivational Story: राजा और बकरे की कहानी! जिसे पढ़कर आपकी दुनिया बदल जायेगी, हमारे जीवन में कई सारी कठिनाइया आती है लेकिन उसका हल भी उसी में होता है। सिर्फ हमें सही दिशा देने वाला होना चाहिए। ऐसे ही कुछ कहानियाँ होती है जो हमें कोई न सबक सीखकर जाती है। ऐसी ही कहानी हम आपके लिए लेकर आये है जिसे पढ़कर आपके जीवन में बदलाव आ सकता है। यह एक राजा और बकरे की कहानी है जिसे पढ़कर आपका नजरिया बदल देगा। आइये पढ़े यह कहानी।

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Motivational Story: राजा और बकरे की कहानी! जिसे पढ़कर आपकी दुनिया बदल जायेगी

पढ़िए पूरी कहानी

“किसी राज्य के राजा के पास एक सुंदर सा बकरा था जिसे वह बहुत प्यार करता था, उसे रोज कोमल घास के साथ सुगंधित हलवा खिलाया करता था। एक बार उसने एलान किया कि जो कोई इस बकरे को खिला पिला कर तृप्त कर देगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा, किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा। इस एलान को सुनकर एक प्रजा राजा के पास आकर कहने लगा की बकरा को तृप्त करना कोई बड़ी बात नहीं है। वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारा दिन उसे घास चराता रहा। शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है, अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ। बकरे के साथ वह राजा के पास गया।”

“राजा ने थोड़ी सी हरी घास और सुगंधित हलुआ बकरे के सामने रखी तो बकरा उसे खाने लगा। इस पर राजा ने उस व्यक्ति से कहा की तूने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह क्यों खाने लगता।इसके बाद बहुतों ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया किंतु ज्योंही दरबार में उसके सामने घास और हलुआ डाली जाती की वह फिर खाने लगता।”

“एक संन्यासी उस राज में ठहरा हुआ था,उनने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है। उसने सोचा मैं युक्ति से काम लूँगा और उस बकरे के प्रकृति के बारे में अध्ययन करता रहा। कुछ दिन उपरांत वो राजा के पास गया और बकरे को अपने साथ लेकर जंगल गया। जंगल में एक युक्ति भिड़ाई, फिर जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से पिटाई कर देता, जितने बार जाता और ज्यादा पिटाई करता, पिटाई का पैमाना बढ़ता जाता। सारा दिन ऐसा कई बार हुआ। अंत में बकरे ने सोचा की यदि मैं खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी,फिर तो बिना खाए चुप चाप खड़ा रहा।”

“शाम को वह संन्यासी बकरे को लेकर राज दरबार में लौटा। बकरे को उसने कुछ नहीं खिलाई थी, फिर भी राजा से कहा मैंने इसको भरपेट खिलाया है। अत: यह अब बिलकुल नहीं खायेगा, आप परीक्षा कर लीजिये।राजा ने बकरे के सामने सुगंधित हलुआ और कोमल कोमल घास डाली, लेकिन यह क्या? उस बकरे ने उसे खाना तो दूर, देखा और सूंघा तक नहीं। बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी की कुछ भी खाऊंगा तो मार पड़ेगी,अत: कुछ नहीं खाया।”

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कहानी से सीख?

यही बकरा हमारा मन है। बकरे को घास चराने ले जाने वाला हमारा जीवात्मा। राजा परमात्मा है। मन कभी तृप्त नहीं हो सकता। एक इच्छा पूर्ण होते ही दूसरा जागृत होता है, भूख कभी शांत नहीं होगी। मन का अगर नियमन किया जाय,मन पर अगर अंकुश रखा जाय तो मन हमारे इच्छाओं के विरुद्ध नियंत्रण में होगा। मन को विवेक रूपी लकड़ी से रोज सीख दी जाए तो वह अपने वासनाओं, इच्छाओं से परे होगा और यह केवल अपने तृप्त होने के कारण को जानने से होगा,वह जानना केवल ध्यान के द्वारा अपने अंदर के खोज से ही संभव होगा। तब त्यक्त मन में त्याग उत्पन्न होगा यही तृप्ति है।

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